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  • Written By: Admin
  • Published: February 25, 2026 04:49 PM IST
  • Updated: February 25, 2026 04:50 PM IST
उत्तराखंड

टिहरी तिहरा हत्याकांड: गर्भवती भाभी, भाई और मां के कातिल को फिर मिली फांसी, 12 साल बाद कोर्ट का कड़ा फैसला

नई टिहरी: उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल को दहला देने वाले 12 साल पुराने तिहरे हत्याकांड में न्याय की जीत हुई है। अपर सत्र न्यायाधीश, टिहरी की अदालत ने दोषी संजय सिंह को एक बार फिर मृत्युदंड (फांसी) की सजा सुनाई है। खून के रिश्तों को कलंकित करने वाले इस अपराधी ने न केवल अपनी गर्भवती भाभी की बेरहमी से हत्या की थी, बल्कि शोर सुनकर आए भाई और मां को भी मौत के घाट उतार दिया था।

2014 की वो काली सुबह: जब तलवार की धार से कांप उठा गांव

यह सनसनीखेज वारदात 13 दिसंबर 2014 की है। दोषी संजय सिंह ने पहले से ही हत्या की साजिश रची थी। उसने घर में रखी तलवार को पत्थर पर घिसकर धार दी और जंगल की ओर निकल गया।

  • पहला शिकार: जंगल में बकरी चरा रही अपनी गर्भवती भाभी कांता देवी पर उसने अचानक हमला किया और तलवार से उनका सिर धड़ से अलग कर दिया।

  • भाई की हत्या: इसके बाद वह गांव लौटा और झाड़ियों में छिप गया। जैसे ही उसका भाई सुरेंद्र सिंह वहां पहुंचा, संजय ने पीछे से वार कर उसे मार डाला।

  • मां को भी नहीं छोड़ा: चीख-पुकार सुनकर मौके पर पहुंची मां मीना देवी पर भी उसने रहम नहीं खाया और उन्हें भी मौत की नींद सुला दिया।

पिता की बंदूक लेकर कमरे में हुआ था कैद, पुलिस ने छोड़े थे आंसू गैस के गोले

वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी अपने पिता की लाइसेंसी बंदूक और खून से सनी तलवार लेकर एक कमरे में छिप गया था। पुलिस जब मौके पर पहुंची, तो उसने सरेंडर करने से मना कर दिया। आखिरकार पुलिस को उसे काबू में करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़ने पड़े, जिसके बाद उसे गिरफ्तार किया जा सका। इस सदमे को पिता बर्दाश्त नहीं कर सके और कुछ समय बाद उनकी भी मृत्यु हो गई।

12 साल की कानूनी लड़ाई: दोबारा सुनाई गई फांसी

इस मामले में कानूनी प्रक्रिया काफी लंबी चली:

  1. 24 अगस्त 2021: निचली अदालत ने पहली बार फांसी की सजा सुनाई।

  2. 10 मई 2022: हाईकोर्ट ने मानसिक जांच के लिए मामला वापस निचली अदालत भेजा।

  3. मानसिक परीक्षण: जांच में दोषी संजय सिंह को पूरी तरह 'फिट' और ट्रायल के योग्य पाया गया।

  4. 25 फरवरी 2026: लंबी सुनवाई और पुख्ता साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने इसे 'जघन्यतम' श्रेणी का अपराध मानते हुए दोबारा फांसी और 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई।

न्याय की मिसाल

अभियोजन पक्ष की ओर से पेश किए गए ठोस गवाहों और वैज्ञानिक साक्ष्यों ने संजय के बचाव के हर तर्क को ध्वस्त कर दिया। अदालत के इस फैसले से पीड़ित पक्ष और क्षेत्र के लोगों ने राहत की सांस ली है। यह फैसला समाज में यह कड़ा संदेश देता है कि कानून की नजर से कोई भी अपराधी बच नहीं सकता, चाहे प्रक्रिया कितनी ही लंबी क्यों न हो।

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