ADVERTISMENT
  • Written By: Admin
  • Published: June 20, 2026 04:48 PM IST
राज्य

भ्रष्टाचार पर सियासतः धामी सरकार का अफसरशाही को कड़ा संदेश, विपक्ष उठा रहा सवाल

देहरादून। उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव 2027 से पहले हरिद्वार नगर निगम के भूमि प्रकरण में धामी सरकार की सख्त कार्रवाई ने राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है। जांच में जिन अधिकारियों की भूमिका सामने आने के बाद सरकार ने कार्रवाई की, उसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की जीरो टालरेंस नीति का बड़ा उदाहरण बताया जा रहा है। वहीं विपक्ष इसे स्वागत योग्य कदम तो मान रहा है, लेकिन यह सवाल भी उठा रहा है कि क्या यह सख्ती हर मामले में समान रूप से लागू होगी या फिर चुनावी साल में सरकार अपनी छवि चमकाने की कोशिश कर रही है। यह प्रकरण अब केवल हरिद्वार नगर निगम तक सीमित नहीं रह गया है। यह पूरे प्रदेश की नौकरशाही, राजनीतिक व्यवस्था और चुनावी माहौल का बड़ा विषय बन गया है। सत्ता, विपक्ष और आम जनता-तीनों की नजर इस बात पर है कि सरकार इस कार्रवाई को आखिर किस मुकाम तक ले जाती है।
मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी लगातार सार्वजनिक मंचों से कहते रहे हैं कि उनकी सरकार भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी स्तर पर समझौता नहीं करेगी। सरकार का दावा है कि पिछले कुछ वर्षों में नकल माफिया के खिलाफ कठोर कानून, भर्ती घोटालों में कार्रवाई, अवैध कब्जों पर अभियान और अब हरिद्वार नगर निगम प्रकरण में त्वरित निर्णय इस बात के प्रमाण हैं कि शासन की प्राथमिकता पारदर्शिता और जवाबदेही है। सरकार के अनुसार यदि जांच में किसी अधिकारी की भूमिका सामने आती है तो उसके पद या प्रभाव की परवाह किए बिना कार्रवाई होगी।
भाजपा का मानना है कि इससे जनता में यह भरोसा मजबूत होगा कि कानून सबके लिए समान है और प्रशासनिक तंत्र में जवाबदेही तय की जा रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि पहले भ्रष्टाचार के मामलों में वर्षों तक फाइलें दबाकर रखी जाती थीं, जबकि वर्तमान सरकार ने कार्रवाई की गति तेज की है। पार्टी इसे निर्णायक नेतृत्व की पहचान के रूप में भी पेश कर रही है। कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और उत्तराखंड क्रांति दल इस कार्रवाई का खुलकर विरोध नहीं कर रहे, लेकिन सरकार की मंशा पर सवाल जरूर उठा रहे हैं। कांग्रेस का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में जीरो टालरेंस की नीति पर चल रही है तो प्रदेश में सामने आए हर भ्रष्टाचार के मामले में समान स्तर की कार्रवाई होनी चाहिए। विपक्ष का आरोप है कि कई मामलों में कार्रवाई की गति धीमी रही, जबकि कुछ मामलों में तत्काल सख्ती दिखाई गई। आम आदमी पार्टी का कहना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई का स्वागत है, लेकिन इसे केवल चुनावी संदेश तक सीमित नहीं रहना चाहिए। दोषियों को न्यायालय में सजा दिलाना ही वास्तविक सफलता होगी। यूकेडी का कहना है कि यदि सरकार ईमानदारी से पूरे प्रशासनिक ढांचे की जवाबदेही तय करती है तो जनता उसका समर्थन करेगी, लेकिन कार्रवाई केवल चुनिंदा मामलों तक सीमित रही तो जनता इसे राजनीतिक प्रबंधन के रूप में देखेगी।
प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि हरिद्वार नगर निगम प्रकरण ने पूरे सरकारी तंत्र को एक स्पष्ट संदेश दिया है कि अब फाइलों में लिए गए निर्णयों की जवाबदेही तय हो सकती है। लंबे समय से यह धारणा रही है कि कुछ अधिकारी नियमों की अलग-अलग व्याख्या कर विवादास्पद फैसले लेते हैं। इस कार्रवाई ने संकेत दिया है कि सरकारी पद अब केवल अधिकार नहीं बल्कि उत्तरदायित्व भी है। यदि आने वाले समय में अन्य विभागों में भी इसी तरह निष्पक्ष कार्रवाई होती है तो इससे प्रशासनिक अनुशासन मजबूत हो सकता है।
जनता की राय इस मुद्दे पर दो हिस्सों में बंटी दिखाई देती है। एक वर्ग का मानना है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ जितनी भी सख्ती हो, उसका स्वागत किया जाना चाहिए। लोगों का कहना है कि यदि अधिकारी और कर्मचारी जवाबदेह होंगे तो सरकारी व्यवस्था में सुधार आएगा और जनता का विश्वास बढ़ेगा। दूसरा वर्ग यह मानता है कि केवल निलंबन या विभागीय कार्रवाई पर्याप्त नहीं है। यदि जांच समयब( पूरी नहीं हुई, दोषियों को कानूनी सजा नहीं मिली और सरकारी नुकसान की भरपाई नहीं हुई, तो ऐसी कार्रवाई का असर सीमित रह जाएगा। जनता अब परिणाम देखना चाहती है, केवल घोषणाएं नहीं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधानसभा चुनाव 2027 में भ्रष्टाचार, सुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही बड़े चुनावी मुद्दे बन सकते हैं। भाजपा इस कार्रवाई को अपनी ईमानदार और निर्णायक सरकार की पहचान के रूप में प्रचारित करेगी। दूसरी ओर विपक्ष यह साबित करने की कोशिश करेगा कि सरकार की सख्ती केवल चुनावी वर्ष तक सीमित है। युवा मतदाता, मध्यम वर्ग और सरकारी सेवाओं से जुड़े लोग इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहे हैं। यही वर्ग चुनावी परिणामों को भी काफी हद तक प्रभावित करता है।
हरिद्वार नगर निगम भूमि प्रकरण में धामी सरकार की कार्रवाई ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि भ्रष्टाचार के मुद्दे को सरकार अपनी सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक ताकत के रूप में पेश करना चाहती है। लेकिन चुनावी राजनीति में केवल कार्रवाई की शुरुआत नहीं, उसका तार्किक और निष्पक्ष निष्कर्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है। यदि सरकार आने वाले समय में बिना किसी भेदभाव के सभी मामलों में समान कठोरता दिखाती है, तो जीरो टालरेंस की नीति एक मजबूत राजनीतिक पूंजी बन सकती है। लेकिन यदि कार्रवाई चुनिंदा मामलों तक सीमित रह गई, तो विपक्ष इसे चुनावी प्रबंधन करार देने में देर नहीं लगाएगा।

ADVERTISMENT

Today’s ePaper

Read today’s ePaper
ADVERTISMENT
ADVERTISMENT
×