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  • Written By: Admin
  • Published: February 21, 2026 05:40 PM IST
  • Updated: February 21, 2026 05:41 PM IST
उत्तराखंड

भारतीय ज्ञान परंपरा से भविष्य की राह: एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम संपन्न

ज्ञान केवल किताबों की पंक्तियों में सीमित नहीं होता, वह पीढ़ियों की चेतना में प्रवाहित होता है। इसी भाव के साथ हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में एमएमटीटीसी के तत्वावधान में ‘पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण’ विषय पर 16 से 21 फरवरी 2026 तक आयोजित छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का गरिमामय समापन हुआ।

समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पवन सिन्हा ‘गुरूजी’ तथा कुलपति श्रीप्रकाश सिंह ने दीप प्रज्वलन कर कार्यक्रम का विधिवत शुभारंभ किया। एमएमटीटीसी के निदेशक प्रो देवेंद्र सिंह नेगी ने अतिथियों का स्वागत करते हुए मुख्य अतिथि को स्मृति चिन्ह एवं अंगवस्त्र भेंट कर सम्मानित किया।

“स्वदेशी ज्ञान ही आत्मनिर्भरता का आधार”

अपने ओजस्वी संबोधन में प्रो पवन सिन्हा ने कहा कि आत्मनिर्भरता, सस्टेनेबिलिटी और क्षमता निर्माण की जड़ें हमारी स्वदेशी ज्ञान परंपरा में ही निहित हैं। उन्होंने क्रायोजेनिक तकनीक और कोरोना काल में देशी अनुसंधान की भूमिका का उदाहरण देते हुए बताया कि भारत ने अपनी वैज्ञानिक क्षमता से वैश्विक स्तर पर सम्मान अर्जित किया है।

उन्होंने प्राचीन गुरुकुल पद्धति, पंचकोशीय विकास, स्त्री-स्वातंत्र्य, लोकतांत्रिक परंपराओं, कौटिल्य के राज्यशास्त्र तथा वेदांत और आधुनिक विज्ञान के अंतर्संबंधों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य की दिशा भी है। शिक्षा का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि चरित्र, विवेक और राष्ट्रीय चेतना का निर्माण करना होना चाहिए।

शोध में प्राचीन दृष्टि की आवश्यकता

अध्यक्षीय संबोधन में कुलपति प्रो श्रीप्रकाश सिंह ने कहा कि ऐसे आयोजन विश्वविद्यालय की शैक्षणिक दृष्टि को सुदृढ़ करते हैं। उन्होंने भारतीय ज्ञान परंपरा के विभिन्न आयामों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आज अकादमिक शोध को प्राचीन भारतीय परिप्रेक्ष्य में समझने और पुनर्समीक्षा करने की आवश्यकता है।

इस अवसर पर संकायाध्यक्ष प्रो मोहन सिंह पंवार, चौरास परिसर निदेशक प्रो राजेंद्र सिंह नेगी, अधिष्ठाता छात्र कल्याण प्रो ओपी गुसाईं, डॉ अमरजीत परिहार तथा यूजीसी के पर्यवेक्षक प्रो आरएल नारायण सिम्हा ने भी अपने विचार रखे। प्रो सिम्हा ने संस्कृत भाषा में संबोधन देकर कार्यक्रम को विशिष्ट आयाम प्रदान किया।

अंत में डॉ राहुल कुंवर ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

95 प्रतिभागियों को मिले प्रमाणपत्र

कार्यक्रम में 95 शिक्षकों एवं शोधार्थियों ने सहभागिता की। अंतिम दिन सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए।

छह दिनों तक चला यह बौद्धिक संगम केवल एक शैक्षणिक आयोजन नहीं, बल्कि उस परंपरा का स्मरण था, जिसने भारत को ‘ज्ञानभूमि’ की पहचान दी। भारतीय ज्ञान परंपरा की यह ज्योति आने वाले समय में शिक्षा और शोध के पथ को और अधिक आलोकित करेगी।

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