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  • Written By: Admin
  • Published: November 15, 2025 03:55 PM IST
उत्तराखंड

“किसी भी विश्वविद्यालय की अकादमिक उन्नति उच्च गुणवत्ता वाले शोध और सुदृढ़ कार्यप्रणाली पर आधारित होती है।”

कु.वि.वि. में दो दिवसीय शोध पद्धति एवं शैक्षणिक लेखन प्रशिक्षण कार्यक्रम सम्पन्न

नैनीताल। कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल के आइक्यूएसी के तत्वावधान में आयोजित दो दिवसीय “शोध पद्धति एवं शैक्षणिक लेखन प्रशिक्षण कार्यक्रम” का शुक्रवार को सफलतापूर्वक समापन हुआ। कार्यक्रम में शोधार्थियों और युवा शिक्षकों ने उत्साहपूर्वक प्रतिभाग किया।

द्वितीय दिवस के प्रथम सत्र में आईआईटी रुड़की के प्रो. मनु गुप्ता ने डेटा संग्रहण एवं सैम्पलिंग तकनीक विषय पर विस्तृत और रोचक व्याख्यान प्रस्तुत किया। उन्होंने शोध में डेटा की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए बताया कि प्राथमिक डेटा—जैसे सर्वेक्षण, साक्षात्कार, अवलोकन और फोकस ग्रुप—तथा द्वितीयक डेटा—जैसे सरकारी रिपोर्ट, शोध लेख और डिजिटल रिपॉज़िटरी—दोनों ही शोध की विश्वसनीयता निर्धारित करते हैं।

उन्होंने सैम्पलिंग फ्रेम, जनसंख्या एवं नमूना, सिंपल रैंडम सैंपलिंग, स्ट्रैटिफाइड सैंपलिंग, नमूना आकार निर्धारण, सैम्पलिंग बायस, नॉन-रिस्पॉन्स बायस और रिस्पॉन्स बायस जैसी अवधारणाओं को सरल उदाहरणों के साथ समझाया। प्रतिभागियों को रिग्रेशन एनालिसिस, क्लासिफिकेशन मॉडल्स तथा डेटा-आधारित निर्णय निर्माण की आधुनिक तकनीकों से भी परिचित कराया गया। इस दौरान उन्होंने कैगल, डेटा.जीओवी.इन और मशीन लर्निंग रिपॉज़िटरी जैसे प्लेटफॉर्मों के उपयोग का प्रदर्शन किया। एक्सेल, एआई टूल्स और इंटरैक्टिव क्विज़ के माध्यम से डेटा विश्लेषण की व्यावहारिक जानकारी भी दी गई, जो शोधार्थियों के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई।

द्वितीय सत्र में दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. जे. एन. सिन्हा ने “हाउ टू राइट ए पीएच.डी. थीसिस एंड कन्वर्ट इट इंटू ए बुक” विषय पर प्रेरक व मार्गदर्शक व्याख्यान दिया। उन्होंने शोध विषय के चयन से लेकर शोधप्रबंध लेखन की संपूर्ण प्रक्रिया को सरल शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि शोध विषय वही चुनना चाहिए जिसमें शोधार्थी की वास्तविक रुचि हो। व्यापक साहित्य समीक्षा, स्पष्ट कार्यप्रणाली, शोध संरचना और सीमाएं शोध की गुणवत्ता को सुदृढ़ बनाती हैं।

उन्होंने प्रभावी लेखन शैली के लिए सरल भाषा, छोटे वाक्यों, स्पष्ट तर्क, संगत अध्याय संरचना और शिकागो मैन्युअल ऑफ़ स्टाइल जैसी अंतरराष्ट्रीय नियमावलियों के उपयोग पर जोर दिया। शोधप्रबंध को पुस्तक में बदलते समय शीर्षक को आकर्षक बनाने, जटिल भाषा को सरल करने, फुटनोट कम करने और सामग्री को पाठक-मैत्री बनाने की आवश्यकता पर भी बल दिया। उन्होंने पुस्तक प्रकाशन की प्रक्रिया—जैसे प्रकाशक चयन, रॉयल्टी, संपादन और पुस्तक प्रस्ताव—पर अपने अनुभव साझा किए।

समापन सत्र में मुख्य अतिथि प्रो. दिव्या यू. जोशी ने शोध पद्धति, भाषा कौशल, संदर्भ प्रबंधन और शैक्षणिक ईमानदारी के महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने प्रतिभागियों को निरंतर अध्ययन, नियमित लेखन अभ्यास और गुणवत्ता-आधारित शोध कार्य करने के लिए प्रेरित किया।

कार्यक्रम समन्वयक प्रो. रीतेश साह ने कहा कि किसी भी विश्वविद्यालय की अकादमिक उन्नति उच्च गुणवत्ता वाले शोध और मजबूत कार्यप्रणाली पर आधारित होती है। ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम न केवल शोध की दिशा और दृष्टि को स्पष्ट करते हैं, बल्कि नवाचार, विश्लेषणात्मक सोच और शैक्षणिक अनुशासन को भी सुदृढ़ बनाते हैं। उन्होंने प्रतिभागियों से आग्रह किया कि वे इस प्रशिक्षण में प्राप्त ज्ञान को अपने शोध कार्य में लागू करें और विश्वविद्यालय व समाज के ज्ञान-दृश्य में सार्थक योगदान दें।

अंत में प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र वितरित किए गए और कार्यक्रम का सफल समापन हुआ।
इस अवसर पर डॉ. नंदन सिंह, डॉ. हर्ष चौहान, डॉ. सरोज, डॉ. अशोक उप्रेती, डॉ. सुरेश जोशी, डॉ. ऋचा गिनवाल, डॉ. दिलीप सहित अनेक संकाय सदस्य एवं शोधार्थी उपस्थित रहे।

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