रामनगर। रेलवे स्टेशन की भीड़भाड़ के बीच जब एक तीन साल की नन्हीं जान सुबक-सुबक कर रो रही थी, तब उसे नहीं पता था कि वर्दी में कुछ लोग उसके लिए 'देवदूत' बनकर आएंगे। शुक्रवार को रामनगर पुलिस ने एक बार फिर साबित कर दिया कि खाकी केवल डंडा चलाने के लिए नहीं, बल्कि टूटते दिलों को जोड़ने के लिए भी है।
वाकया तब शुरू हुआ जब कुछ राहगीर रेलवे स्टेशन पर बिलखती हुई एक बच्ची को लेकर कोतवाली पहुंचे। बच्ची डरी हुई थी। उसे महिला डेस्क पर तैनात कांस्टेबल रेशु को सौंपा गया। महिला पुलिसकर्मी ने जब उसे पुचकारा, तो उसने अपना नाम अनबिया, पिता का नाम उस्मान और माता का नाम रेशमा बताया। वह अपनी टीचर का नाम आरजू तो बता पा रही थी, लेकिन अपने घर का रास्ता उसके नन्हें दिमाग से ओझल था।
कोतवाली के मुंशी शेखर बिष्ट, कांस्टेबल संजय सिंह और महिला कांस्टेबल रेशु ने बिना वक्त गंवाए मोर्चा संभाला। बच्ची की फोटो और उसके द्वारा बताए गए नामों को व्हाट्सएप ग्रुप्स और सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल किया गया। एक तरफ फोन की घंटियां बज रही थीं, तो दूसरी तरफ कांस्टेबल संजय सिंह बच्ची को गोद में लेकर उन नामों के आधार पर गली-गली खाक छान रहे थे।
आखिरकार पुलिस की मेहनत रंग लाई और बच्ची का सुराग ग्राम पूँछड़ी में मिला। जब पुलिस बच्ची को लेकर उसके पिता उस्मान के पास पहुंची, तो उनकी आंखों में खुशी के आंसू छलक पड़े। पिता ने बताया कि वह बच्ची को रेलवे स्टेशन के पास उसकी नानी के घर छोड़ कर आया था, जहां से वह खेलते-खेलते भटक गई।
जब अनबिया अपने पिता की गोद में पहुंची, तो उसकी मासूम मुस्कान ने कोतवाली के हर पुलिसकर्मी की थकान मिटा दी। परिजनों ने रामनगर पुलिस का बार-बार आभार व्यक्त किया।
अमर उजाला की अपील: छोटे बच्चों के कपड़ों या जेब में एक छोटी सी पर्ची पर अपना मोबाइल नंबर और पता जरूर लिखें। आपकी थोड़ी सी सावधानी बच्चों को सुरक्षित रख सकती है।






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