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  • Written By: Admin
  • Published: November 25, 2025 11:09 AM IST
उत्तराखंड

"गुलदार के बाद अब भालू का आतंक! रुद्रप्रयाग में वन्यजीव हमलों से बढ़ी दहशत—मौतें लगातार बढ़ रहीं"

रुद्रप्रयाग जिले में वर्ष 2025 के दौरान वन्यजीव हमलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इस वर्ष अब तक गुलदार के हमलों में 4 लोगों की मौत हुई है, जबकि 12 लोग घायल हुए हैं। वहीं भालू के हमलों में अब तक 14 लोग घायल हो चुके हैं। वर्ष 2022 से वर्तमान वर्ष तक के आंकड़ों पर नज़र डालें तो 2025 में वन्यजीव हमलों से सर्वाधिक मौतें और घायल होने के मामले सामने आए हैं। वर्तमान में भी जिले के विभिन्न क्षेत्रों में गुलदार और भालू का आतंक बना हुआ है।

जिले में गुलदार और भालू की बढ़ती गतिविधियों से स्थानीय लोग दहशत में हैं। आए दिन कहीं न कहीं इन जंगली जानवरों के हमले से लोग घायल हो रहे हैं। खासकर भालू का आतंक काफी बढ़ गया है, जो न केवल इंसानों बल्कि मवेशियों पर भी हमला कर रहा है।

पिछले चार वर्षों के आंकड़ों पर गौर करें तो वर्ष 2022 में गुलदार ने 5 लोगों की जान ली थी और 6 लोग घायल हुए थे। उसी वर्ष भालू के हमले में 1 व्यक्ति की मौत और 4 लोग घायल हुए थे। वर्ष 2023 में गुलदार के हमले से 1 व्यक्ति की मौत और 2 लोग घायल हुए, जबकि भालू के हमले में 8 लोग घायल हुए। वर्ष 2024 में गुलदार के हमलों में 11 लोग घायल हुए थे। इस वर्ष भालू के हमले में 2 लोगों की मौत और 3 लोग घायल हुए थे।

वर्ष 2025 में अब तक गुलदार के हमलों में 4 लोगों की मौत और 12 लोग घायल हुए हैं। इसी अवधि में भालू 14 लोगों को घायल कर चुका है। इसके अलावा, बंदरों के हमले से भी अब तक 20 लोग घायल हुए हैं। कुल मिलाकर, इस वर्ष जंगली जानवरों के हमलों के मामलों में पिछले वर्षों की तुलना में अधिक मौतें और घायल सामने आए हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग भयभीत हैं और वन्यजीवों के हमलों के कारण उनकी दिनचर्या प्रभावित हो रही है।

खुले में कचरा मिलने से वन्यजीव आकर्षित हो रहे
रुद्रप्रयाग जिले में मानव-वन्यजीव संघर्ष, विशेषकर भालू से संबंधित घटनाओं के बढ़ते मामलों को देखते हुए प्रभागीय वन अधिकारी (DFO) रजत सुमन की अध्यक्षता में एक आपात बैठक आयोजित की गई। सभी रेंजों से क्षेत्रवार विवरण लेकर ग्राम-वार आकलन किया गया, जिसमें जुलाई से अब तक 128 गांव संवेदनशील पाए गए हैं।

डीएफओ रजत सुमन ने बताया कि अक्टूबर से अब तक लगभग 350 गांवों और विद्यालयों में जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए गए हैं। साथ ही घर-घर संपर्क और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के माध्यम से भी जागरूकता बढ़ाई जा रही है। उन्होंने बताया कि वन क्षेत्रों में कम फल, भोजन की कमी, खुले में फेंका गया कचरा और जलवायु परिवर्तनों के कारण भालुओं के व्यवहार में बदलाव देखा जा रहा है।

संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों के निरीक्षण के दौरान यह पाया गया कि जहाँ खुले में जैविक कचरा फेंका गया है, वहाँ घटनाएँ अधिक हो रही हैं। इस पर सभी रेंज अधिकारियों को निर्देश दिए गए कि खुले में कचरा डालकर वन्यजीवों को आकर्षित करने वालों के खिलाफ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत कार्रवाई की जाए। अत्यधिक संवेदनशील गांवों में फॉक्स लाइट्स के उपयोग को बढ़ावा देने, अधिक उपकरण और अतिरिक्त कार्यबल उपलब्ध कराने जैसे कदम ज़मीनी स्तर पर उठाए जा रहे हैं ताकि प्रतिक्रिया क्षमता को मजबूत किया जा सके।

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