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  • Written By: Admin
  • Published: February 16, 2026 06:04 PM IST
  • Updated: February 16, 2026 06:08 PM IST
उत्तराखंड

एचएनबी गढ़वाल विश्वविद्यालय में भारतीय ज्ञान परंपरा पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का शुभारंभ

श्रीनगर (गढ़वाल), 16 फरवरी 2026
देवभूमि की धरती से एक बार फिर भारतीय चिंतन की स्वर-लहरियाँ उठीं, जब Hemvati Nandan Bahuguna Garhwal University के चौरास स्थित शैक्षणिक क्रियाकलाप केंद्र में “पाठ्यक्रम में भारतीय ज्ञान परंपरा का एकीकरण” विषय पर छह दिवसीय क्षमता निर्माण कार्यक्रम का शुभारंभ हुआ।

एमएमटीटीसी के तत्वावधान में आयोजित इस प्रशिक्षण में 95 से अधिक शिक्षक और शोधार्थी भाग ले रहे हैं। उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में Rashtriya Sanskrit Sansthan, नई दिल्ली के प्रो. आरएल नारायण सिन्हा यूजीसी पर्यवेक्षक के रूप में उपस्थित रहे।

“भारतीय ज्ञान परंपरा वैश्विक विमर्श की आधारशिला”

मुख्य अतिथि प्रो. सिन्हा ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा केवल अतीत का गौरव नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के वैश्विक ज्ञान-विमर्श की मजबूत नींव है। उन्होंने जोर दिया कि यदि भारतीय शिक्षा प्रणाली में अपनी जड़ों का समावेश होगा, तो वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर नई पहचान बनाएगी।

अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो. एनएस पंवार ने भारतीय संस्कृति की उस समृद्ध बौद्धिक परंपरा को रेखांकित किया, जिसने विश्व के ज्ञान-विज्ञान को दिशा दी। चौरास परिसर निदेशक प्रो. आर.एस. नेगी और प्रो. राजेंद्र सिंह नेगी ने भी भारतीय ज्ञान परंपरा की समकालीन प्रासंगिकता पर अपने विचार रखे।

कार्यक्रम समन्वयक डॉ. अमरजीत सिंह ने प्रशिक्षण की रूपरेखा साझा करते हुए बताया कि इसका उद्देश्य शिक्षकों को भारतीय ज्ञान प्रणाली के दार्शनिक, सांस्कृतिक और व्यावहारिक आयामों से परिचित कराना है, ताकि वे इसे अपने पाठ्यक्रम में प्रभावी रूप से समाहित कर सकें।

एक दिन में पाँच सत्र, गहन विमर्श

प्रथम दिवस पर पाँच अकादमिक सत्र आयोजित हुए। Sri Dev Suman Uttarakhand University की प्रो. कल्पना पंत ने भारतीय दर्शन की आधारभूमि स्पष्ट करते हुए कहा कि वेद, उपनिषद और विभिन्न दर्शन-शास्त्रों से निर्मित भारतीय चिंतन परंपरा ज्ञान को आत्मानुभूति, नैतिकता और लोकमंगल से जोड़ती है।

उन्होंने न्याय, सांख्य, योग, मीमांसा और वेदांत को सत्य की बहुविध खोज का प्रतीक बताया। वहीं अमेटी विश्वविद्यालय के एसोसिएट प्रोफेसर एवं यूजीसी प्रशिक्षक डॉ. कुसाग्र ने भारतीय ज्ञान प्रणाली को शिक्षा, समाज, शासन और स्वास्थ्य से जुड़ी एक जीवंत संरचना बताया। उन्होंने कहा कि इसे वैज्ञानिक दृष्टि और आलोचनात्मक चिंतन के साथ आधुनिक पाठ्यक्रम में समुचित स्थान मिलना चाहिए।

शिक्षा में जड़ों की ओर लौटने का प्रयास

कार्यक्रम के अंत में डॉ. सोमेश थपलियाल ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए कुलपति प्रो. श्रीप्रकाश सिंह और एमएमटीटीसी निदेशक प्रो. डीएस नेगी के मार्गदर्शन के लिए आभार जताया। संचालन डॉ. पुनीत वालिया और शोधार्थी सागर पुरी ने किया।

स्पष्ट है कि यह पहल केवल एक प्रशिक्षण कार्यक्रम नहीं, बल्कि भारतीय शिक्षा को उसकी वैचारिक जड़ों से जोड़ने की गंभीर कोशिश है—जहां परंपरा और आधुनिकता का संतुलित समन्वय भविष्य की दिशा तय करेगा।

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