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  • Written By: Admin
  • Published: May 04, 2026 01:30 PM IST
उत्तराखंड

उत्तराखण्ड के पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ सूखने की कगार पर

देहरादून। उत्तराखंड के पहाड़ी गांव पलायन के कारण आज खाली हो गए हैं और इसके साथ ही पहाड़ की वह विरासत भी खत्म होने के कगार पर है। आज वह विरासत भी अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही जो सदियों से यहां के गांवों की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र होती थी। यहां बात हो रही है हिमालय की वादियों में स्थित गांवों में सदियों से प्यास बुझाते आ रहे पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ की। यह प्राकृतिक जल स्रोत, आधुनिकता की चकाचौंध और जलवायु परिवर्तन की मार के कारण धीरे-धीरे सूखने की कगार पर हैं।
पहाड़ के जीवन में पारंपरिक जल स्रोत ‘धारा’ और ‘नौले’ का विशेष महत्व रहा है। यह ‘धारा’ और ‘नौले’ सिर्फ प्यास ही नहीं बुझाते थे, बल्कि यह गांवों में सामुहिकता की एक मिशाल थी। सुबह-शाम ‘धारा’ और ‘नौले’ के आसपास महिलाओं और ग्रामीणों का जमावड़ा लगता था, जिससे आपसी संवाद और सामुदायिक एकता मजबूत होती थी। कई स्थानों पर धाराओं के पास देवस्थल भी बनाए गए, जहां लोग जल को पवित्र मानकर उसकी पूजा करते हैं।
गांवों में स्थानीय लोगों ने पीढ़ियों से इन जल स्रोतों को संरक्षित रखने के लिए प्राकृतिक संतुलन बनाए रखा। धारा के आसपास के जलग्रहण क्षेत्र में पेड़-पौधों का संरक्षण किया जाता था और वहां किसी प्रकार का निर्माण कार्य नहीं होने दिया जाता था। यही कारण था कि यह स्रोत सालभर पानी उपलब्ध कराते थे। लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध में यह सब नहीं हो रहा है और लोग मोबाइल और टीबी पर चिपके रहते हैं। इस कारण प्राकृतिक जलस्रोत भी आज अकेले होकर दम तोड़ने लग गए है।
विशेषज्ञों के अनुसार सिर्फ यही एक कारण नहीं है बल्कि वनों की अंधाधुंध कटाई, सड़क और भवन निर्माण, और जलवायु परिवर्तन इसके प्रमुख कारण हैं। पहाड़ों में हो रहे अनियोजित विकास ने जलग्रहण क्षेत्रों को नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा, गांवों से हो रहे पलायन के चलते इन स्रोतों की नियमित देखरेख भी कम हो गई है। धाराओं के सूखने से गांवों में पेयजल संकट गहराता जा रहा है। कई क्षेत्रों में अब लोगों को दूर-दराज से पानी लाना पड़ता है या फिर सरकारी टैंकरों पर निर्भर रहना पड़ रहा है। इससे न केवल दैनिक जीवन प्रभावित हो रहा है, बल्कि पारंपरिक जीवनशैली भी टूट रही है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि समय रहते इन स्रोतों के संरक्षण के लिए ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो भविष्य में स्थिति और गंभीर हो सकती है। जलग्रहण क्षेत्रों में पौधरोपण, वर्षा जल संचयन और पारंपरिक ज्ञान को बढ़ावा देने जैसे उपाय कारगर साबित हो सकते हैं। साथ ही, स्थानीय समुदाय की भागीदारी भी बेहद जरूरी है।

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