देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड एक बड़े प्रशासनिक बदलाव की दहलीज पर खड़ा है। देशभर में जनगणना की अधिसूचना जारी होने के साथ ही प्रदेश में इसकी तैयारियां युद्धस्तर पर शुरू हो गई हैं। इस बार की जनगणना पुरानी यादों की तरह फाइलों और कागजों में दफन नहीं होगी, बल्कि यह पूरी तरह डिजिटल और हाईटेक होगी।
बदरी-केदार और दुर्गम गांवों से होगा आगाज उत्तराखंड की भौगोलिक परिस्थितियां हमेशा से एक चुनौती रही हैं। इसे देखते हुए जनगणना निदेशक ईवा आशीष श्रीवास्तव ने मास्टर प्लान तैयार किया है। भारी बर्फबारी और दुर्गम रास्तों को ध्यान में रखते हुए बदरीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री और राज्य के 131 दुर्गम गांवों में जनगणना की प्रक्रिया इसी साल सितंबर में शुरू कर दी जाएगी। जबकि प्रदेश के अन्य हिस्सों में मुख्य जनगणना 9 से 28 फरवरी 2027 के बीच होगी।
पहली बार मिलेगी 'सेल्फ-एन्युमरेशन' की सुविधा इस जनगणना की सबसे बड़ी खूबसूरती यह है कि इसमें नागरिकों को 'स्व-जनगणना' का अधिकार दिया जा रहा है। जल्द ही एक विशेष पोर्टल लॉन्च होगा, जहां आप अपने मोबाइल नंबर से पंजीकरण कर खुद अपनी जानकारी भर सकेंगे। इसके बाद आपको एक यूनिक आईडी मिलेगी, जिसे बस आपको प्रगणक (Enumerator) को दिखाना होगा।
प्रशिक्षण के लिए तैनात होंगे 30 हजार 'डिजिटल सिपाही' राज्य को लगभग 30 हजार गणना क्षेत्रों में बांटा गया है। मुख्य सचिव की अध्यक्षता वाली कमेटी ने इसका खाका खींच लिया है, जिसे मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की अंतिम मुहर का इंतजार है।
प्रगणक: स्थानीय शिक्षक (3 दिन का विशेष प्रशिक्षण)।
निगरानी: 6 प्रगणकों पर एक सुपरवाइजर।
तकनीक: सीएमएमएस पोर्टल और मोबाइल ऐप के जरिए रीयल-टाइम रिपोर्टिंग।
प्रशासनिक सीमाएं हुई 'सील' जनगणना की शुद्धता बनाए रखने के लिए 31 दिसंबर 2025 की स्थिति के अनुसार राज्य की सभी प्रशासनिक सीमाएं (गांव, वार्ड, नगर, जिला) सील कर दी गई हैं। मार्च 2027 तक इनमें कोई भी परिवर्तन नहीं किया जा सकेगा।
यह सिर्फ आंकड़ों का खेल नहीं है, बल्कि उत्तराखंड के हर उस अंतिम व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश है जो पहाड़ों की कंदराओं में रहता है। डिजिटल तकनीक के जरिए अब सरकार की नीतियां सीधे आपकी यूनिक आईडी से जुड़ेंगी।






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