देहरादून। उत्तराखंड में झरने और गाड़ गदेरों के अस्तित्व को जानने की कोशिश की जा रही है। यह पहला मौका है, जब देश में झरनों की गिनती का काम हो रहा है। उत्तराखंड में लघु सिंचाई विभाग के अलावा हिमोत्थान संस्था इस काम को कर रही है। इसमें खास बात यह है कि इस गणना के होने से पहली बार यह जाना जा सकेगा कि उत्तराखण्ड राज्य में कितने झरने और गाढ़ गदेरे मौजूद हैं।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बहने वाले झरने और गाड़-गदेरे सदियों से लोगों की जिंदगी का आधार रहे हैं। उत्तराखण्ड के गांवों की पेयजल व्यवस्था से लेकर खेती-किसानी तक इन्हीं प्राकृतिक जल स्रोतों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है, लेकिन विडंबना यह है कि आज तक न तो राज्य सरकार और न ही केंद्र सरकार के पास इन जल स्रोतों की वास्तविक संख्या का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद रहा है। अब पहली बार देश में झरनों और गाड़-गदेरों की व्यवस्थित गणना की जा रही है, जिससे इनके अस्तित्व, स्थिति और भविष्य को लेकर ठोस जानकारी सामने आ सकेगी। उत्तराखंड में लघु सिंचाई विभाग भारत सरकार के सहयोग से इस महत्वाकांक्षी अभियान को चला रहा है। वहीं, हिमालयी क्षेत्रों में जल स्रोतों के संरक्षण और अध्ययन पर काम करने वाली हिमोत्थान संस्था भी स्वतंत्र रूप से झरनों की गणना और दस्तावेजीकरण कर रही है। दोनों प्रयासों का उद्देश्य एक ऐसा व्यापक डेटाबेस तैयार करना है, जिसके आधार पर भविष्य में जल संरक्षण और पुनर्जीवन की योजनाएं बनाई जा सकें। उत्तराखंड में झरनों की गणना का कार्य अब अंतिम चरण में पहुंच चुका है। अधिकारियों के अनुसार अगले एक महीने के भीतर यह प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। इसके बाद पहली बार राज्य सरकार के पास यह स्पष्ट आंकड़ा होगा कि प्रदेश में कुल कितने झरने और गाड़-गदेरे मौजूद हैं।
यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि पिछले कई वर्षों से विशेषज्ञ लगातार चेतावनी देते रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन, अनियोजित विकास और खेती-किसानी में कमी के कारण प्राकृतिक जल स्रोत तेजी से प्रभावित हो रहे हैं। कई इलाकों में झरने पूरी तरह सूख चुके हैं, जबकि कई का जलस्तर लगातार घट रहा है। इसके बावजूद अब तक कोई ऐसा आधिकारिक रिकॉर्ड मौजूद नहीं था, जिसके आधार पर समस्या की वास्तविक गंभीरता को समझा जा सके।






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