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  • Written By: Admin
  • Published: July 26, 2026 11:35 AM IST
  • Updated: July 27, 2026 11:36 AM IST
राज्य

उत्तराखंड के पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट: जमीनी नेता से जनसेवक तक का सफर

देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में वरिष्ठ कांग्रेस नेता एवं पूर्व मंत्री हीरा सिंह बिष्ट का राजनीतिक जीवन संघर्ष, संगठन के प्रति समर्पण और जनसेवा का उदाहरण रहा। उन्होंने जमीनी स्तर से राजनीति की शुरुआत की और अपनी कार्यशैली, सादगी और जनता से सीधे जुड़ाव के दम पर अलग पहचान बनाई।

कांग्रेस के मजबूत स्तंभ रहे बिष्ट ने उत्तराखंड राज्य निर्माण आंदोलन में भी सक्रिय भूमिका निभाई। वे मानते थे कि अलग राज्य बनने पर ही पहाड़ का विकास संभव है। कर्मचारी संगठन इंटक (इंडियन ट्रेड यूनियन कांग्रेस) के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में वह कर्मचारियों, मजदूरों के हितों की रक्षा के लिए संघर्षरत रहे।

राजनीतिक सफर

  • बिष्ट का राजनीतिक सफर 1970 के दशक में डीएवी पीजी कालेज छात्रसंघ के अध्यक्ष से शुरू हुआ।
  • कांग्रेस संगठन में उन्होंने लंबे समय तक विभिन्न जिम्मेदारियां निभाईं और कार्यकर्ताओं के बीच मजबूत पकड़ बनाई।
  • सक्रिय राजनीति में उनकी शुरुआत वर्ष 1977 के लोकसभा चुनाव से हुई और तब उन्होंने टिहरी लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन सफलता नहीं मिली।
  • वर्ष 1985 में उन्होंने विधानसभा की देहरादून सीट से चुनाव लड़ा और उप्र विधानसभा में पहुंचे।
  • खेल गतिविधियों में विशेष रुचि रखने वाले बिष्ट ने उस समय देहरादून में अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम के लिए भूमि की उपलब्धता की पहल की थी, जिस पर उत्तराखंड बनने के बाद कांग्रेस के शासनकाल में ही स्टेडियम ने आकार लिया।
  • उत्तराखंड बनने के बाद वर्ष 2002 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में राजपुर सीट से विधानसभा पहुंचे
  • एनडी तिवारी सरकार में परिवहन, श्रम एवं तकनीकी शिक्षा मंत्री के रूप में जिम्मेदारी निभाई।
  • वर्ष 2014 में विधानसभा की डोईवाला सीट के उपचुनाव में उन्होंने जीत दर्ज की। इसके बाद वह निरंतर विधानसभा चुनाव लड़ते रहे, लेकिन सफल नहीं हो पाए।

कांग्रेस संगठन में चुनावी रणनीति, संगठनात्मक गतिविधियों और विभिन्न अभियानों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रही। राजनीतिक मतभेदों के बावजूद सभी दलों के नेताओं के बीच वह लोकप्रिय रहे। उन्हें सौम्य व सुलझे नेता के रूप में देखा जाता था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिष्ट उन नेताओं में थे, जिन्होंने राजनीति को सत्ता नहीं बल्कि जनसेवा का माध्यम माना। उनका सार्वजनिक जीवन सादगी और संवाद की संस्कृति का प्रतीक रहा।

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