केंद्र सरकार ने ‘वंदे मातरम्’ को लेकर महत्वपूर्ण फैसला लेते हुए नए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अब सभी सरकारी कार्यक्रमों, शैक्षणिक संस्थानों और प्रमुख औपचारिक आयोजनों में राष्ट्रगान ‘जन गण मन’ के तुरंत बाद ‘वंदे मातरम्’ का पूर्ण संस्करण (छहों छंद) बजाना अनिवार्य होगा।
गीत के दौरान कार्यक्रम में उपस्थित सभी लोगों को सावधान मुद्रा में खड़े होकर सम्मान प्रकट करना होगा। हालांकि सरकार ने स्पष्ट किया है कि यह नियम सिनेमा हॉल में फिल्मों के प्रदर्शन के दौरान लागू नहीं होगा।
गृह मंत्रालय के दिशा-निर्देशों के अनुसार:
सभी सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रगान के तुरंत बाद ‘वंदे मातरम्’ बजेगा।
स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों में भी इसका पालन किया जाएगा।
पद्म पुरस्कार जैसे नागरिक सम्मान समारोहों में गीत का वादन अनिवार्य रहेगा।
राष्ट्रपति और राज्यपालों के आगमन व प्रस्थान, तथा उनके संबोधन से पहले और बाद में इसे बजाया जाएगा।
राष्ट्रीय ध्वज फहराने के अवसर पर भी यह व्यवस्था लागू होगी।
नए निर्देशों के तहत अब ‘वंदे मातरम्’ के सभी छहों छंद प्रस्तुत किए जाएंगे। उल्लेखनीय है कि 1937 में कांग्रेस के फैजपुर अधिवेशन में गीत के केवल पहले दो छंदों को औपचारिक मान्यता दी गई थी।
अब सरकार ने इसे उसके मूल स्वरूप में प्रस्तुत करने का निर्णय लिया है। पूर्ण संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड बताई गई है।
‘वंदे मातरम्’ की रचना बंकिम चंद्र चटर्जी ने वर्ष 1875 में की थी और 1882 में प्रकाशित उनके उपन्यास ‘आनंदमठ’ में इसे शामिल किया गया।
प्रारंभिक छंदों में मातृभूमि को प्रकृति की समृद्धि और सौंदर्य के रूप में चित्रित किया गया है, जबकि आगे के छंदों में उसे शक्ति, ज्ञान और समृद्धि की प्रतीक देवी के रूप में दर्शाया गया है।
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान यह गीत लाखों देशवासियों के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। अब केंद्र सरकार के इस निर्णय को ऐतिहासिक राष्ट्रगीत को उसके पूर्ण स्वरूप में सम्मान देने की पहल के रूप में देखा जा रहा है।
आने वाले समय में सरकारी आयोजनों में राष्ट्रगान के बाद ‘वंदे मातरम्’ की समवेत गूंज एक नई औपचारिक परंपरा के रूप में सुनाई देगी, जो राष्ट्रभावना को और प्रगाढ़ करने का प्रयास मानी जा रही है।






.jpeg)








Copyright © 2026 News Bank. Designed & Developed by Digital Clik