बागेश्वर। मातृभूमि की रक्षा के लिए तीन-तीन बड़े युद्धों में अपना पराक्रम दिखाने वाले नरगोली गांव के गौरव, पूर्व सैनिक लाल सिंह रौतेला अब यादों में शेष रह गए हैं। बुधवार को सरयू के पावन तट पर उनके बड़े पुत्र बिशन सिंह और मंझले पुत्र दीपक सिंह ने उन्हें मुखाग्नि दी। उनके अंतिम सफर में जनसैलाब उमड़ पड़ा, हर किसी की आंखें अपने इस जांबाज बुजुर्ग को विदाई देते हुए नम थीं।
युद्ध के मोर्चों पर लिखी थी वीरता की गाथा 25 दिसंबर 1933 को जन्मे लाल सिंह रौतेला 1956-57 में सेना के सिग्नल कोर में भर्ती हुए थे। उनके करियर की सबसे बड़ी पूंजी वह दौर रहा जब देश संकट में था। उन्होंने 1962 के भारत-चीन युद्ध, 1965 के भारत-पाक युद्ध और 1971 के ऐतिहासिक युद्ध में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। 1977 में सेना से सेवानिवृत्त होने के बाद वे गांव में ही रहकर समाज सेवा और परिवार के मार्गदर्शन में जुटे रहे।
अंतिम समय में भी दिखाई जिजीविषा बढ़ती उम्र की तकलीफों के चलते मंगलवार को उन्हें बेरीनाग अस्पताल ले जाया गया था, जहां से उन्हें हल्द्वानी रेफर किया गया। लेकिन नियति को कुछ और ही मंजूर था; हल्द्वानी ले जाने की तैयारी के बीच ही उन्हें दिल का दौरा पड़ा और उन्होंने अंतिम सांस ली।
देश सेवा का जज्बा परिवार की रगों में स्व. रौतेला अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़ गए हैं। उनके संस्कार ही थे कि उनका सबसे छोटा बेटा गणेश रौतेला इस समय ITBP में डिप्टी कमांडेंट के पद पर तैनात हैं और वर्तमान में अफगानिस्तान में भारतीय शांति सेना का हिस्सा बनकर देश का मान बढ़ा रहे हैं। उनके दो अन्य बेटे शिक्षा जगत में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
शोक की लहर उनके निधन पर कपकोट विधायक सुरेश गड़िया, पूर्व विधायक ललित फर्स्वाण सहित क्षेत्र के तमाम गणमान्य व्यक्तियों और पत्रकारों ने गहरा शोक व्यक्त किया है। सभी ने एक स्वर में कहा कि लाल सिंह जी का जाना एक युग का अंत है और उनकी वीरता आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।






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