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  • Written By: Admin
  • Published: July 02, 2026 04:36 PM IST
राज्य

रामपुर तिराहा गोलीकांडः फर्जी हथियार बरामदगी केस में तीन पूर्व पुलिसकर्मी दोषी

देहरादून। उत्तराखंड राज्य आंदोलन से जुड़े मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा गोलीकांड में फर्जी हथियार बरामदगी केस में सीबीआई कोर्ट ने फैसला सुनाया है। करीब 32 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद अदालत ने तत्कालीन छपार थाने के एसएचओ बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार को दोषी करार देते हुए डेढ़-डेढ़ वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई है। साथ ही तीनों पर 21-21 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया गया है।
विशेष सीबीआई अदालत के पीठासीन अधिकारी डीके फौजदार ने दोनों पक्षों की गवाहियों, दस्तावेजी साक्ष्यों और लंबी सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया। फैसले की जानकारी देते हुए अधिवक्ता अनुराग वर्मा ने इसे न्याय की लड़ाई में एक ऐतिहासिक पड़ाव बताया।
 यह मामला साल 1994 के उस दर्दनाक रामपुर तिराहा कांड से जुड़ा है, जब पृथक उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर दिल्ली जा रहे राज्य आंदोलनकारियों पर यूपी के मुजफ्फरनगर में रामपुर तिराहे पर पुलिस ने गोलीबारी की थी। इस गोलीबारी में 6 लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल भी हुए थे।
 इस घटना के बाद पुलिस ने अपनी कार्रवाई को सही साबित करने के लिए आंदोलनकारियों पर हथियार बरामदगी का फर्जी मामला दर्ज किया। दावा किया गया कि आंदोलनकारी अवैध तमंचे, कारतूस और धारदार हथियार लेकर आए थे और उन्होंने पुलिस पर फायरिंग की थी, जिसके जवाब में पुलिस को गोली चलानी पड़ी। लेकिन जब मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई तो जांच में कई चैंकाने वाले तथ्य सामने आए। सीबीआई ने पाया कि हथियारों की बरामदगी पूरी तरह फर्जी थी। जांच में यह भी सामने आया कि जब्ती मेमो तैयार किए गए और कई गवाहों से खाली कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए। बाद में इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर आंदोलनकारियों को अपराधी साबित करने की कोशिश की गई। सीबीआई ने तत्कालीन एसएचओ बृजकिशोर, कांस्टेबल उमेश चंद और अनिल कुमार के खिलाफ फर्जी दस्तावेज तैयार करने, धोखाधड़ी, जालसाजी और आपराधिक साजिश की धाराओं में चार्जशीट दाखिल की थी।
 लंबे समय तक चले ट्रायल के बाद अदालत ने माना कि पुलिस ने झूठे साक्ष्य गढ़कर न्याय व्यवस्था को गुमराह करने का प्रयास किया और निर्दोष आंदोलनकारियों को बदनाम करने की साजिश रची। करीब 32 वर्षों तक मुजफ्फरनगर की अदालत में चले इस मुकदमे के फैसले को उत्तराखंड आंदोलन के इतिहास में बेहद अहम माना जा रहा है।

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