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  • Written By: Admin
  • Published: October 11, 2026 03:10 PM IST
राज्य

शारदीय नवरात्रि के पहले दिन उमड़ी मायादेवी मंदिर में श्रद्धालुओं की भीड़

हरिद्वार। रविवार से शारदीय नवरात्रि शुरू हो गए हैं। इस पावन अवसर पर धर्मनगरी हरिद्वार के प्राचीन मायादेवी मंदिर में सुबह से ही श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा। मां के दर्शन और पूजा अर्चना के लिए स्थानीय श्रद्धालुओं के साथ ही दूसरे राज्यों से आने वाले भक्त भी पहुंचते हैं। धार्मिक मान्यता है कि मायादेवी मंदिर माता सती के 52 शक्तिपीठों में शामिल है। पौराणिक महत्व के कारण यह मंदिर हरिद्वार के प्रमुख धार्मिक स्थलों में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां पूजा अर्चना करने से भक्तों की सभी मुराद पूर्ण होती हैं।नवरात्रि को लेकर मंदिर को रंग बिरंगी लाइटों और फूल मालाओं से सजाया गया है।
 मायादेवी मंदिर का इतिहास 11वीं शताब्दी से जुड़ा माना जाता है। श्री पंच दशनाम जूना अखाड़ा मंदिर का संचालन करता है। मंदिर में मां मायादेवी की पूजा की जाती है, जिन्हें हरिद्वार की अधिष्ठात्री देवी भी माना जाता है। प्राचीन समय में हरिद्वार को मायापुरी के नाम से जाना जाता था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां मायादेवी के नाम से इस क्षेत्र की पहचान जुड़ी हुई है। गंगा स्नान के लिए हरिद्वार आने वाले श्रद्धालु मां के दरबार में भी शीश नवाते हैं।
 मायादेवी मंदिर की धार्मिक मान्यता माता सती और भगवान शिव से जुड़ी पौराणिक कथा से संबंधित है। मंदिर के मुख्य पुजारी भास्कर पुरी महाराज के अनुसार, प्राचीन समय में राजा दक्ष ने हरिद्वार के ही कनखल यज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया। पिता के यज्ञ में पहुंचीं माता सती अपने पति का अपमान सहन नहीं कर सकीं और उन्होंने यज्ञ में अपने प्राण त्याग दिए। माता सती के वियोग में भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे।
ऐसी मान्यता है कि सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, उन्हें शक्तिपीठ के रूप में पूजा जाने लगा। मायादेवी मंदिर को भी इसी पौराणिक परंपरा से जुड़ा शक्तिपीठ माना जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यहां माता सती की नाभि गिरी थी। मंदिर के मुख्य पुजारी भास्कर पुरी महाराज ने बताया कि माता सती का नाम माता उमा था। बाद में उनका नाम सती हो गया। यहां माता सती ने योगबल पर अपना शरीर छोड़ा था।माता सती का प्रथम अंग जिसे नाभि कहा जाता है, यहां स्थापित है। इसलिए यहां माता का दर्शन करने से 52 शक्तिपीठों के फल की प्राप्ति होती है।

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